विपरीत समय में भावनाओं पर काबू पाना समझदारी है- डॉ. संदीप कटारिया

क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन  के राष्ट्रीय  अध्यक्ष डा. संदीप कटारिया ने बताया कि आज के समय में हम भावनात्मक नाटकों में उलझे रहना हमारी आदत सी बन गई है। यानी हम किसी भी परिस्थिति को बढ़ा-चढ़ा कर देखने के अभ्यस्त हो गए हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाली सहज घटनाएं जैसे दूध का उफन कर गिन जाना या महत्वपूर्ण मीटिंग पर जाते समय ट्रैफिक  जाम में फंस जाना भी हमारे अंदर भावनात्मक उबाल लाने के लिए पर्याप्त हैं। आए-दिन होने वाली इस तरह की घटनाओं से हम न सिर्फ अपने जीवन में तनाव-जनित बीमारियों को आमंत्रित करते हैं, बल्कि भावनाओं की यह बेलगाम अभिव्यक्ति हमें हमारे आत्मीयों से भी दूर कर देती है। हमारे भीतर इतना अधिक भावनात्मक उबाल क्यों? इसके दुश्परिणाम और इससे बचने के उपाय सवाल बनकर कौंधने लगते हैं।
इस जीवन की वास्तविकता यही है कि जिन भावनाओं का हम दमन करते हैं वे कुछ समय बाद हमारे ही भीतर कुरूक्षेत्र में बदल जाते हैं। फिर हम प्रतिपल स्वयं से लड़ रहे होते हैं और इस लड़ाई में अंततोगत्वा हार हमारी ही होती है। आमतौर पर भावनात्मक परिपक्वता के लिए भावनाओं से थोड़ी दूरी बनाने की सलाह दी जाती है। यह सलाह भावनात्मक दबाव में उलझे मनुश्य को अटपटी लगती है। कारण कि वह अपने अंदर उठ रही प्रेम, दया, करूणा जैसी सकारात्मक भावनाएं को तो स्वीकार करता है, पर नकारात्मक भावनाएं जैसे क्रोध, द्वेश, ईश्र्या आदि का विरोध या निशेध करने से बचता है।
आप प्रकट में कहते हैं कि मनुश्य को उदार बनना चाहिए पर स्वयं के प्रति कठोर होते हैं। बिना अवकाष लिए कार्य करते हैं और उसे कार्य के प्रति प्रेम का नाम देते हैं, जबकि यह स्वयं के प्रति हिंसा है। ऐसे में जब आप थोड़ी भी कठिन परिस्थिति का सामना करते हैं तो आपकी प्रतिक्रिया आवष्यकता से अधिक बढ़-चढ कर होती है। जैसे आपका बच्चा परीक्षा में असफल हो जाता है तो आप उसे आवष्यकता से अधिक बुरा भला कह देते हैं और यह भी जोड़ देते हैं कि वह कभी अच्छा नहीं कर पाएगा। भावनात्मक विस्फोट के समय कही गई ये कड़वी बातें आपके बच्चे में भावनात्मक उबाल की “ाुरूआत करती हैं। ऐसा भी हो सकता है कि वह आपकी कही बातों को ही अपने जीवन का सच मान ले। ऐसा सच जो सोच पर निर्भर है, उसे उपनिशद में ‘ऋत’ कहा गया है। अपना बनाम पराया का भाव भी इसी सोच से जन्म लेता है, जो वास्तविकता में मोह की अभिव्यक्ति है। ‘मोह’ में न सिर्फ प्रेम होता है, बल्कि ‘अधिकार या स्वामित्व का भी भाव होता है। अधिकार न सिर्फ व्यक्तियों एवं वस्तुओं पर जताया जाता है, बल्कि यह जीवन के बहाव को नियंत्रित करने का भी नाम है।
जीवन के बहाव में अड़चन उत्पन्न करना न सिर्फ आनंद में बाधक है बल्कि आपके भावनात्मक उबाल का कारण भी है। जैसे आप ट्रैफिक जाम में फंस जाएं तो गाड़ी के अंदर कितना भी हॉर्न बजा लें आगे एक कदम नहीं बढ़ेंगे, वैसे ही विपरीत परिस्थिति में चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लें हासिल कुछ नहीं होगा। जैसे जाम में फंस कर गूगल मैप देख कर आप जानना चाहते हैं कि यह जाम कितनी दूर लगा हुआ है, वैसे ही विपरीत समय में आस्था एवं विष्वास आपको भावनात्मक संतुलन देता है जिसके बाद आप कठिन क्षणांे में “ाांत रह पाएंगे और बिना बिफरे वह करेंगे जो आपको करना चाहिए।

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