प्रसन्नचित होकर कर्म करें तो लक्ष्य को पाना निश्चित है – डा. संदीप कटारिया

क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. संदीप कटारिया ने बताया कि आधा जीवन गुजर जाने पर हमें अपनी दिनचर्या नीरस लगने लगती है। जैसे गन्ने से रस निकाल लिया जाए तो वह शुष्क हो जाताहै, वैसे ही ऊब भरी दिनचर्या में कुछ भी नया नहीं लगता क्योंकि दफ्तर में आप एक मुकाम पर पहुंच गए होते हैं। बच्चे अपने जीवन में आगे बढ़ गए होते हैं और दांपत्य जीवन में भी वह रोमांच शेष नहीं रह जाता है।

चालीस-पैंतालीस की उम्र में महसूस की जाने वाली निराशा मिड लाइफ क्राइसिस कहलाती है। इससे कोई अछूता नहीं है। इस समय तक वे सभी तत्व जो हमारी कामनाओं का आधार हैं और हमारे अस्तित्व को निर्धारित करते हैं-रोजगार, समाज में प्रतिष्ठा और परिवार को हम मोटा-मोटी पूरा कर लेते हैं अर्थातू रोजमर्रा के एक ढर्रे पर हमारी जिंदगी चल रही होती है और कई बार हम विगत कल का अवलोकन करते हुए थोडे निराश हो जाते हैं हमें ऐसा प्रतीत होता है कि हम अपनी उम्मीदों और अपेक्षाओं के मापदंड पर अधूरे रह गए हैं और अपने वाले भविष्य के प्रति हम कुछ ना उम्मीद हो जाते हैं। धीरे-धीरे यह ऊब मानसिक थकान में और फिर शीघ्र ही निराशा में बदल जाती है। यह हमारी समझ का फेर है क्योंकि अभी कहानी में मध्यांतर आया है। पर हम भूलवश इसे अंत मान लेते हैं, जिससे हमारा दृष्टिकोण जीवन के प्रति नकारात्मक हो जात है।

कल्पना कीजिए कि आप एक शिल्पकार हैं और अपने जीवन की श्रेष्ठतम कृति बना रहे हैं। अब आप आधे पर पहुंच गए हैं तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? आप निराश हो जाएंगे या फिर दोगुने उत्साह के साथ अपनी कृति को पूर्ण करेंगे? निश्चित तौर पर आप अपनी रचना को पूर्ण करना चाहेंगे और उत्साहित होंगे क्योंकि आधी कृति तो बन गई है, बस आधी ही शेष है। अगर आपको पता नहीं है कि आप कोन सी कृति बना रहे हैं, तो आप निश्चित रूप से निराश हो जाएंगे। मिड लाइफ क्राइसिस से जूझ रहे लोगों के लिए गिलास आधा भरा होता ही नहीं है, बल्कि आधा खाली ही रहता है और यह निराशावादी दृष्टिकोण उन्हें जीवन के इस पड़ाव पर नए प्रयोग करने से रोकता है एवं जब वे एक रस वाली जिंदगी से समझौता कर लेते हैं तब अपने जीवन की ऊब से घबराने लगते हैं।

हमंे अपनी जीवन में दो बातों पर ध्यान रखना चाहिए। पहला, हम अपने जीवन से क्या चाहते हैं, हमने क्या लक्ष्य बनाया है? और दूसरा, उस लक्ष्य को पाने के लिए हम कितने उत्साहित हैं? आपका जीवन किताब के खाली पन्नों की तरह है। इसमें आप क्या भरेंगे यह आपका निर्णय है। अगर आधी किताब आपने अपने अनुसार नहीं लिखी है तो शेष आधी तो आप लिख ही सकते हैं। विश्वास करके चलें कि सब कुछ उस परमात्मा का है, तब आप संकुचित होकर कर्म करने के बजाय उत्साहित होकर जीवन की इस मध्यावधि में भी नई शुरूआतों का संकल्प लेंगे।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *