क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ . संदीप कटारिया ने बताया कि प्रदूशण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जो बहस हुई है, उससे यही पता चलता है कि कोई सरकार इस मामले में अपना काम नहीं कर रही है। जस्टिस अरूण मिश्रा और जस्टिस दीपक गुप्ता के सवालों के सामने चार-चार मुख्य सचिवों की हालत ऐसी हो गई थी जैसे अपना होम वर्क कापी घर भूल आए हों और टीचर के सामने पेट दर्द का बहाना बना रहे हों। अदालत ने किसानों का पक्ष लिया। साफ कर दिया कि पराली की समस्या किसानों की नहीं, राज्य की जिम्मेदारी है। सरकार द्वारा फंड की दलील नहीं स्वीकार की जा सकती है। किसानों को सजा देना केाई समाधान नहीं है। उन्हें मूल सुविधांए और संसाधन मुहैया कराना जरूरी है। उनकी मदद की बजाए कानूनी कार्रवाई की आलोचना की और कहा कि इससे कानून व्यवस्था की स्थिति पैदाहो जाएगी। गरीब किसान आत्महत्या करने पर मजबूर होगा। मुख्य सचिवों से कहा कि आपको किसानों की मदद करनी होगी। अदालत ने आदेश दिया कि छोटे और सीमांत किसानों को 7 दिनों के अंदर प्रति एकड़ 100 रूपये की मदद दी जाए ताकि वे पराली न जलाएं। पंजाब हरियाणा और यूपी के किसानों के लिए यह आदेश है। इसमें केंद्र का हिस्सा कितना होगा, बाद में तय होगा। कोर्ट ने यह भी कहा है कि तीन महीने के अंदर छोटे और सीमांत किसानों की हितों की रक्षा के लिए केंद्र व्यापक योजना बनाए जिसे पूरे देश में लागू होगा। मॉनिटरिंग कमेटी से कहा कि वह देखे की कोर्ट के इन आदेशों का पालन होता है या नहीं होता। दिल्ली के मुख्य सचिव विजय कुमार देव, हरियाणा के मुख्य सचिव के. ए. अरोड़ा, पंजाब के मुख्य सचिव करण अवतार सिंह और यूपी के मुख्य सचिव राजेन्द्र कुमार तिवारी आज का दिन “ाायद ही कभी भूल सकें। उम्मीद है अदालत इस मामले में कोई ठोस सख्ती की पहल करेंगी। हम एक-एक करके बताएगंे कि किस मुख्य .सचिव की बारी आई तो किसकी होम वर्क कापी घर छूट गई थी। पंजाब के मुख्य सचिव करण अवतार सिंह को बेच ने आगे बुलाया पूछा कि आप ये बताइए कि पूरे साल किया क्या? पता चला कि बताइए कि पता चला कि पराली जलने वाली है तो पहले से तैयारी क्यों नहीं की? पंजाब के मुख्य सचिव ने फंड की कमी की बात की तो कोर्ट ओर नराज हो गया। अदालत ने कहा कि आप एक राज्य सरकार हैं आप केंद्र सरकार के भरोसें क्यों रहते हैं? अगर आपके पास फंड नहीं है या योजनाएं नहीं है तो आपको मुख्य सचिव रहने का कोई हक नहीं। गरीब किसानांे पर कार्रवाई से कुछ नहीं होगा। उन्हें मूलभूत सुविधाएं देनी होगी। यही नहीं पंजाब के मुख्य सचिव से अदालत ने कहा कि क्यों न हम आपको यहि से सस्पेंड करके भेज दें। केंद्र सरकार की तरफ से अटरनी जनरल, के. के वेणु गोपाल ने कहा कि दिल्ली के आसमान के ऊपर जो धुंध है उसका 44 प्रतिशत पराली से आता है। लेकिन दो लाख किसानों को पराली जलाने से नहीं रोका जा सकता। वो अनिच्छुक है और उनकी आजीविका प्रभावित होगी। तब कोर्ट ने पूछा कि जब हरियाणा रोक सकता है तो पंजाब क्यांे नहीं? तब हरियाणा के मुख्य सचिव के. ए. अरोड़ा को लगा होगा कि उनका नंबर नहीं आएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ जब हरियाणा के मुख्य सचिव ने कहा कि हमने छोटी और लंबी अवधि की योजनाएं बनाई है तो उन्हें भी फतकार पड़ गई। तब अदालत ने कहा कि यह तरीका नहीं है छोटे किसानों को मशीनें नहीं मिल रही हैं। हरियाणा सरकार के मुख्य सचिव ने कहा हमने डेढ़ सौ लोगों को मशीनें दी हैं जो कम किराए पर किसानों को दे रहे हैं। इस पर कोर्ट ओर नराज हो गया और पूछा कि क्या आपने जमींदारी प्रथा की तरह बिचैलिये नियुक्त कर दिए हैं। कोर्ट ने पूछा ये लोग किसान से कितना पैसे लेते हैं। वकील ने बताया कि प्रति एकड़ किसानों से 600 रूपए लेते हैं। तब अदालत ने कहा कि किसान इतना पैसा कहां से लाएगा। किसानों के प्रति अदालत की हमदर्दी सराहनीय हैं। अदालत किसानों के प्रति संवेदनशील थी। जजों के सवाल से साफ था उनकी नजर में यह बात स्पश्ट हो गई हैं कि किसान अकेले इस समस्या को नहीं टाल सकता। ना हि किसानों को जिम्मेदार ठहराकर बचा जा सकता है। सरकार को ही जिम्मेदारी लेनी होंगी ये मोटी लाइन आज कोर्ट ने खींच दीं। कोर्ट ने कहा कि अब जागरूक करने का समय चला गया है। अब काम करने का टाइम आ गया है। इस बीच यूपी के मुख्य सचिव राजेन्द्र कुमार तिवारी अपना नाम बताने लगे तब अदालत ने कहा हमें आपके नाम में नहीं काम में दिलचस्पी हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब की तुलना में यूपी में 1 फीसदी पराली जलती हैं। तो यही वाली बात हुई कि होम वर्क घर छूट गया और फॉर्मूला याद हैं। तब कोर्ट ने कहा कि आप ऐसे तुलना नहीं कर सकते हैं। किसानों के खिलाफ कार्रवाई से बचिए उनकी मदद कीजिए कितनी अच्छी बात हैं। दिल्ली के मुख्य सचिव विजय कुमार देव से पूछा कि आप दिल्ली के मुख्य सचिव की कुर्सी पर ही क्यों हैं। क्या ये राजधानी हैं। पूरी दिल्ली में धूल दिखाई देती है। आपको ही जिम्मेदार ठहराना चाहिए। निगमों के भरोसे कुछ नहीं छोड़ना चाहिए। निगमों में भ्र्रश्टाचार है। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में 13 हाट स्पॉट प्रदशण के चुने गए हैं। सात दिन में हालात सुधरने चाहिए। मुख्य सचिव ने कहा कि हम सात दिन में कदम उठाएंगे पर्यावरण मार्शल लगाएंगे। इस पर कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में सड़कें कागजों पर बन रही हैं। स्मार्ट सिटी का क्या हुआ। यह एक बहुत अच्छा प्रश्न है। स्मार्ट सिटी का सवाल पूरे देश से गायब हो गया हैं। लेकिन दिल्ली में कोर्ट में ले आया। करोड़ो रूपए विश्व बैंक से मिलते हैं। सारा पैसा कहां जाता है? एक हफ्ते में गडढें भरने हैं, स्टेटस रिपोर्ट दायर करनी हैं। ये दिल्ली के मुख्य सचिव को आदेश मिला हैं। जहां जहां गड्ढें हो उनकी फोटो छींच कर दिल्ली के मुख्य सचिव के ट्वीटर एकाउंट पर डालिए वो भर दिए जाएंगे। दिल्ली को केवल मानिटरिंग कमेटी बचा रही है बाकी हर कोई निशाना साद रहा है। वाहनों का प्रदूशण कम हैं मगर निर्माण कार्य, कूडा जलाने और सड़कों की ध्ूाल पर अंकुश नहीं है। अगली सुनवाई 8 नवंबर और आधे हिस्से पर सुनवाई 15 नवंबर को होगी। क्या आज की फटकार के बाद राज्य सरकारें गरीब किसानों पर मुकद्मा करना बंद करेंगी जिन्हें अब तक की जाने वालीे कार्रवाई की बड़ी मिसाल के रूप में बताया करती थी। ट्रिब्यून की खबर के अनुसार अंबाला में ही जिला प्रशासन ने 43 किसानों पर 95000 हजार का जुर्माना लगाया है और चार किसानों पर मुकद्मा दर्ज किया हैं। यूपी में 150 किसानों पर मुकद्मा किया गया है। पंजाब में 196 किसानों को गिरफ्तार किया गया हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यही कहा कि इस तरह से हम किसानों को खुदकुशी के रास्ते पर ढकेल रहे देंगे। राज्यों की जिम्मेदारी हैं कि पराली की समस्या से निपटने के लिए किसानों की मदद करें।
