दीपक बाहर का अंधकार मिटाता है तो ज्ञान अंदर का – डॉ. संदीप कटारिया

क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संदीप कटारिया ने बताया  कि इंसान ईष्वर से साक्षात्कार के लिए नाना प्रकार के उपक्रम करता है। वह मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारा जाता है। पूजा, उपासना, आराधना, वंदना, आरती, उपवास करता है। हिंदू गीता-रामायण पढ़ता है। तो मुसलमान कुरान। बौद्ध धम्मपद पढ़ता है, जैन आगम-षास्त्र, सिख गुरूग्रंथ साहिब पढ़ता है तो क्रिष्चियन बाइबिल। ये सब ईष्वर से मिलने के प्रयत्नों की प्रस्तुतियां है। प्रभु की सत्ता का साक्षात्कार आत्मदर्षन की कठिनतम साधना है। लेकिन एक बार जो भीतर में विराजित ईष्वर से साक्षात्कार की तड़प को जगा लेता है, उसे प्रभु-सत्ता  का अहसास हो जाता है। तब संसार सागर को तैरने के लिए नौका के रूप में भी शरीर पर्याप्त लगता है।

ईष्वर रूपी अनमोल संपदा अंतर में व्याप्त है, किन्तु इंसान उससे अनभिज्ञ है। हमारा पुराना साहित्य इसी सत्य की ओर संकेत करता है। वेद, पुराण, उपनिशद, रामायण, गीता, भागवत आदि सब यही सीख देते हैं। जिसका एक बार आत्मा की ओर झुकाव हो जाता है, उसकी परमात्मा की ओर यात्रा आरंभ हो जाती है। उसके सारे क्लेश मिट जाते हैं। हृदय में आनंद का सागर लहराने लगता है। जिसका अंतर निर्मल है, जो अहिंसा का उपासक हैै, मानवीय मूल्यों का साधक है, उसके लिए कठोर होते हुए भी यह मार्ग उतना ही सुगम है, जितना  सांस लेना।

जिन्होंने इस मार्ग को स्वीकार किया, वे किसी दूसरे लोक से नहीं आए थे, इसी मृत्युलोक के थे। अंतष्चेतना जगी, लौ लगी और चल पड़े मुक्त भाव से उस मार्ग पर, जिसे ‘हरि का मार्ग’ कहा जाता है। कहने का तात्पर्य यह कि जो उस रास्ते पर चलता है, उसमें ईष्वरीय भाव प्रकट होने लगती है। उसमें ईष्वरीय आभा प्रकट होने लगती है। ईसा ने कहा है, ‘बैकुंठ तुम्हारे हृदय में है।’ उसी आधार पर गांधीजी ने रामराज्य की कल्पना प्रस्तुत की है। अन्य महापुरूशों ने भी आत्मिक चेतना को जाग्रत करने के लिए भीतर के द्वार खोलने का आहृान किया। ईष्वर का साक्षात दर्षन करने वाला संसार में शायद ही कोई होगा, लेकिन उसका अनुभव करने वाले असंख्य व्यक्ति हैं। ईष्वर सबके अंतर में निवास करता है। किसी संत के शब्दों में ‘वह घट-घट वासी है।’ यदि हम मन, वचन, कर्म से शुद्ध हो जाएं, बाहर-भीतर से मलिनता को दूर कर दे दांतो हमें अनुभव होगा कि ईष्वर हर घड़ी हमारे साथ है। हमारे भीतर जो चेतन-तत्व है, वही तो ईष्वर है।

मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा में लोग प्रायः गलत कार्य की हिम्मत नहीं करते, क्योंकि मानते हैं कि उसमें परम सत्ता निवास करती है। व्यक्ति के अंदर जाने-अनजाने यह भय बना रहता है कि यदि उसने उस पवित्र स्थान पर कोई बुरा काम किया तो उसका अनिश्ट हुए बिना नहीं रहेगा। इस शरीर-रूपी मंदिर में भी ईष्वर के निवास का भान मनुश्य को बहुत-सी बुराइयों से बचा सकता है। आत्मा भी प्रभु का अंष मानी जाती है। जो अंतर्मुखी होकर उसकी आराधना करते हैं, उनका जीवन सार्थक हो जाता है। जिस प्रकार प्रज्जवलित दीपक बाह्म अंधकार को दूर कर देता है, उसी प्रकार अंतज्र्योति अज्ञन के अंधकार को मिटा देती है और शुद्ध कर्म का मार्ग प्रषस्त कर देती है। किसी महापुरूश ने ठीक ही कहा है कि काम छोटा हो या बड़ा, उसके लिए भीतरी शुद्धि पहली शर्त है। दार्षनिक रूमी ने कहा भी है, ‘ जो कुछ भी तुम्हें अपने करीब ले जाए, निर्मल बना दे, वह राह सही है।’

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