डा. संदीप कटारिया राष्ट्रीय अध्यक्ष क्राईम रिफार्मर एसोसियेशन ने कहा कि मानव जीवन विधाता की अनोखी देन है। पुरूष व महिला जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं जिनके ताल-मेल द्वारा सुखी व सार्थक जीवन संभव है। वैदिक संस्कृति में स्त्री को लक्ष्मी व देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया हैं। अर्धांगिनी व जननी के रूप में स्त्री का दर्जा पुरूष से बड़ा माना गया हैं। एक जिम्मेदार गृहणी के रूप में महिला परिवार की मजबूत नींव होती है। बच्चों का लालन-पालन में महिला का योगदान अद्वितीय है। बच्चों की पहली शिक्षका मां होती है। वही बच्चों मे संस्कार प्रदान करके उन्हें चरित्रवान व योग्य नागरिक बनाती हैं। इस संदर्भ में हमारी बहु-बेटियां कौम व राष्ट्र की शान हैं। उन्हें अच्छी शिक्षा व सम्मान मिलना चाहिए।
डा. कटारिया ने बताया कि हमने सर्वप्रथम सुखबीर सिंह दलाल द्वारा लिखित ‘जाट वीरांगनाऐ’ नामक पुस्तक से महारानी किशोरी व अन्य महिला सूरमाओं का अध्ययन किया। युद्ध के दौरान एक जाट वीर ने अपने तीर से सिकंदर की छाती को बींध दिया था जिस कारण उसे अपने देश वापिस लौटना पड़ा और रास्ते में ही दम तोड़ दिया। शैलजा नामक वीरांगना ने युद्ध में मारे गए अपने परिजनों का बदला सिकंदर के सेनापति का सिर अपनी तलवार से काटकर लिया था।
निसंदेह हमारी बहु-बेटियां हमारी कौम व राष्ट की आन, बान, शान हैं। शिक्षा विकास का ठोस आभार है। लगभग 100 वर्ष पूर्व आर्य समाज व खाप पंचायतों द्वारा महिला शिक्षा को बल दिया गया है। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के जाट बाहुल्य क्षेत्रों मंे अनेक स्थानों पर कन्या गुरूकुल व छात्रावास आदि की स्थापना हुई। शिक्षा के कारण हमारी शिक्षित महिलाएं आज राजनीति, व्यापार, शिक्षा, सर्विसज आदि क्षेत्रों में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर रही हैं। खेलों में हमारी बेटियां आगे बढ़ रही है। आज हमारी बेटिया सेना में पायलट हैं और अन्य विभागों में भी अपना परचम फहरा रही हैं।
डा. कटारिया ने कहा वास्तव में बेटियां बेटों से ज्यादा प्रतिभावान व गुणवान होती हैं उदाहरण के तौर पर मेरी बेटी डॉ. रीतु ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली की गोल्ड़ मेडलिस्ट है। उसने 23 वर्ष की आयु में ‘युवा वैज्ञानिक अवार्ड’ से जीतकर इतिहास रचा। मालूम हो ‘युवा वैज्ञानिक अवार्ड’ 35 वर्ष की आयु तक के साईटिस्ट को दिया जाता है।
डा. कटारिया ने बताया कि आज गांवों में घर-गृहस्थी व खेत खलिहान में महिलाओं का योगदान सर्वाधिक हैं। जहां इस मशीनी युग में पुरूष वर्ग हरामखोरी में ताश खेलता है, शराब पीता है, वहीं बहु-बेटियां खेतों में कार्य करती है। बैलगाड़ियों द्वारा खुद पशुओं का चारा आदि खेतों से लाकर घर-गृहस्थी को सभालती हैं। अतः महिला वर्ग को उचित सम्मान देना आवश्यक है। महिला शिक्षा पर सर्वाधिक दिया जाना चाहिए। नारी शक्ति व विकास की प्रतीक विभिन्न क्षेत्रों में अपना परचम फहराने वाली चुनिंदा बहनों व बेटियों की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया हैं।

