सफलता की राह में छोटे-छोटे लक्ष्य भी काम के होते हैं – डा. संदीप कटारिया

क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. संदीप कटारिया ने कहा कि हम सबके कुछ सपने हैं जिन्हें साकार करने के लिए हम कोई कसर नहीं रख छोड़ते। हम जैसे- जैसे अपने लक्ष्य को पाने के लिए आगे बढ़ते हैं हमारे प्रयास और अधिक तेज हो जाते हैं। लक्ष्य के अत्यधिक निकट पहुंचने पर हमें अपने लक्ष्य के अतिरिक्त और कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। यह स्वाभाविक ही है। सफलता का मूल मंत्र भी यही है। ओलंपिक खेलों को ही लीजिए। दशकों तक कठिन परिश्रम करने के बाद ही कोई खिलाड़ी पदक हासिल करने के लिए आगे आ पाता है।वर्ष 1988 में सियोल में आयोजित ओलिंपिक मुकाबलों में नौकायन की एकल प्रतिस्पर्धा में भाग लेने के लिए कनाड़ा के लॉरेंस लेम्यूक्स एक दशक से भी अधिक समय से कठोर प्रशिक्षण ले रहे थे।

उनका सपना साकार होने में बस थोड़ा ही समय शेष रह गया था। लॉरेंस के गोल्ड मेडल जीतने की प्रबल संभावना थी लेकिन मौसम खराब होने के कारण एक चूक के कारण वे दूसरे स्थान पर आ गए। फिर भी वह उत्साह के साथ आगे बढ़ते रहे। जब लॉरेंस तेजी से अपनी नाव चलाते हुए सही दिशा में आगे बढ़ रहे थे तो उन्होेंने देखा कि एक दूसरी प्रतिस्पर्धा के नाविकों की नाव बीच समुद्र में उलटी पड़ी है। एक नाविक किसी तरह नाव से लटका हुआ था जबकि दूसरा समुद्र में बह रहा था। दोनों बुरी तरह से घायल थे। लॉरेंस ने अनुमान लगाया कि सुरक्षा नौका अथवा बचाव दल के आने में देर लगेगी और यदि इन्हे तत्काल सहायता नहीं मिली तो इनका बचना असंभव होगा।

लॉरेंस के सामने दो विकल्प थे। मेडल पाने का उनका लक्ष्य उनके सामने था। अतः उनका पहला विकल्प था इस दुर्घटनाग्रस्त नाव के चालकों को नजरंदाज करके अपना पूरा ध्यान केवल अपने लक्ष्य को पाने के लिए अपनी नौका और रेस पर केंद्रित करना और दूसरा विकल्प था दुर्घटनाग्रस्त नाव के चालकों की मदद करना। लॉरेंस ने बिना किसी हिचकिचाहट के फौरन अपनी नाव उस दिशा में मोड़ दी जिधर उलटी हुई दुर्घटनाग्रस्त नाव समुद्र की विकराल लहरों में हिचकोले खा रही थी। लेम्यूक्स ने बिना देर किए दोनों घायल नाविकों को एक-एक करके अपनी नाव में खींच लिया और तब तक वहीं इंतजार किया जब तक कि कोरिया की नौसेना आकर उन्हें सुरक्षित निकाल नहीं ले गई।

प्रश्न उठता है कि लॉरेंस लेम्यूक्स ने अपने जीवन की एकमात्र महान उपलब्धि को अपने हाथों से यूं ही क्यों फिसल जाने दिया? इसका सीधा सा उŸार है लॉरेंस के श्रेष्ठ जीवन मूल्य। लॉरेंस के जीवन मूल्य इस तथ्य पर निर्भर नहीं थे कि विजेता होने के लिए किसी भी कीमत पर ओलिंपिक मेडल प्राप्त करना ही एकमात्र विकल्प है। लॉरेंस को प्रतिस्पर्धा में तो कोई पदक नहीं मिल सका लेकिन अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक कमेटी द्वारा लॉरेंस को उनके साहस, आत्म-त्याग और खेल भावना के लिए पियरे द कूबर्तिन पदक प्रदान किया गया।

हमारे जीवन में भौतिक लक्ष्य भी हों और उन्हें पाने के लिए सदैव प्रयासरत रहें लेकिन जीवन में कुछ दैवी लक्ष्य भी होते हैं। उनकी ओर ध्यान देकर ही हम वास्तविक विजेता बन सकते हैं। लॉरेंस लेम्यूक्स ने भी यही किया जिसने उन्हें अपने देश के लोगों के दिलों का ही नहीं दुनिया के लोगों के दिलों का सम्राट बना दिया।

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