हिन्दी के सम्मान से क्षेत्रीय भाषाओं को अनदेखा नहीं किया जा रहा हैं – डॉ. संदीप कटारिया

क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संदीप कटारिया ने बताया कि हिन्दी भारत में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा के पद पर सुशोभित किया गया था। हिन्दी को स्थापित करना और विषाल भारत भूमि की गौरवषाली भाषा बनाना महात्मा गांधी का सपना था। 1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में महात्मा गांधी ने ही हिंदी भाशा को राष्ट्रभाषा बनाने की शुरूआत की थी। 1949 में स्वतंत्र भारत की राजभाषा क्या हो, इस प्रश्न पर 14 सिंतबर 1949 को काफी विचार-विमर्ष के बाद हिंदी को राजभाशा का दर्जा दिया गया, लेकिन राजनीतिक कारणों से गैर हिंदी भाषी राज्य खासकर दक्षिण भारत के लोगों ने इसका विरोध किया, जिसके चलते अंग्रेजी को भी राजभाभाषा का दर्जा देना पड़ा। जबकि हम देखें तो पाएंगे कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय यह हिंदी की ही शक्ति थी, जिसने पूरे देश को एक सूत्र में पिरोया था और आंदोलन को नई दिशा दी थी। कौन भूल सकता है नेता जी सुभाश चंद्र बोस के उद्घोश को ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ जिसने हजारों लोगों को स्वतंत्रता के यज्ञ में आहुति देने के लिए प्रेरित कर दिया। वो हिन्दी में ही था। यह किसी भाषा की ही शक्ति हो सकती है जो इतिहास बदल सकती है। भाषा हमेशा ही देश की संस्कृति का परिचायक होती है। वह देश की छवि को विश्व पटल पर रखती है। भारत के संदर्भ में राष्ट्रीय भाषा के लिए हिंदी के महत्व को बहुत से लोगों ने बताया है। मगर शायद ही कोई यह बता पाया हो कि कितनी हिंदी इतनी जरूरी है? हिन्दी दिवस पर जब गृहमंत्री अमित शाह ने एक राष्ट्र-एक भाषा की बात कही तो पूरे देश खासकर दक्षिण भारत में बवाल खड़ा हो गया। तमिलनाडु में डीएमके नेता स्टेलिन, अभिनेता से नेता बने कमल हासन ने विरोध का झंडा उठा लिया। आंध्र प्रदेश, पं बंगाल  से भी ऐसे ही सुर सुनाई पड़े। शोर मचाया जाने लगा कि केंद्र की एनडीए गठबंधन सरकार क्षेत्रीय भाषाओं की अनदेखी करके हिन्दी को प्रोत्साहित करने का प्रयास कर रही है। हमेशा से यही होता आया है कि हिन्दीकी बात आते ही छोटे-छोटे राजनीतिक दलों के अपने हित आड़े आने लगते हैं। कर्नाटक में पिछले दिनों हिन्दी के विरोध के माध्यम से राजनीतिक दलों को अपनी दुकान को चमकाते देखा था। इन्होने  नम्मा मेट्रो के हिंदी नाम पर कालिख पोती दी। जबकि अमित शाह ने केवल हिन्दी को बढ़ावा देने की बात की थी, लेकिन राजनीति करने वालों ने इसे क्षेत्रीय भाशा की अनदेखी से जोड़ दिया। जबकि सरकार का इरादा ऐसा कतई नहीं था। अगर ऐसा होता तो बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त राश्ट्र महासभा के अपने संबोधन में तमिल कवि कणियन पूंगुन्ड्रनार का उल्लेख करते। केवल इतना ही नहीं आईआईटी मद्रास के दीक्षांत समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि तमिलनाडु दुनिया की सबसे पुरानी भाषा तमिल का तो घर है ही साथ ही दुनिया की सबसे नई भाषा आईआईटी मद्रास लिंगो के जन्मदाताओं है में एक है। प्रधानमंत्री के इस कथन से साफ है कि सरकार न केवल क्षेत्रीय भाशाओं का सम्मान करती है, बल्कि उन्हें आग बढ़ाने के लिए भी प्रयासरत है। जहां तक हिन्दी के प्रश्न है तो वह हमारी राजभाषा है। किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषाऔर उसकी संस्कृति से होती है। अगर भारत के लिए भाषा का प्रश्न आएगा तो हिन्दी का नाम ही सबसे पहले लिया जाएगा। हिन्दी को प्रोत्साहित करना राष्ट्रधर्म है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि हम किसी क्षेत्रीय भाशा की अनदेखी या अपमान कर रहे हैं। कुछ लोग अपने राजनीतिक हितों के लिए ऐसा करके न केवल जनता को गुमराह करते बल्कि राजद्रोह भी करते हैं। राजभाषा का विरोध को राष्ट्र विरोध के ही समान है।

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