क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. संदीप कटारिया ने बताया कि तीन तलाक बिल पर कांग्रेस व उसके सहयोगी दलों का विरोध हैरान करने वाला है। यह दल वोटबैंक के लिए महिलाओं के शोषण को भी अनदेखा करने को तैयार हैं। देश का सर्वोच्च न्यायालय भी कह चुका है कि यह मुस्लिम महिलाओं के शोषण का प्रतीक है, उन्हें इंसाफ मिलना चाहिए। सीजेआई ने तीन तलाक को असंवैधानिक बताते हुए कानून बनाने को कहा था। कोर्ट के फैसले के बाद भी देश में तीन तलाक के 345 मामले सामने आए हैं कि आखिर एक सामाजिक बुराई को रोकने के लिए कानून का सहारा क्यों लिया जा रहा है? यह खोखला तर्क है कि भारत ही नहीं, विश्व के अन्य देश भी तीन तलाक पर रोक लगाने के लिए कानून का सहारा ले चुके हैं। क्या दहेज प्रथा और बाल विवाह पर कानून नहीं बनाए गए। वोटबैंक के लालच मंे ये दल समझने को तैयार नहीं हैं कि किसी भी सामाजिक बुराई से निपटने के लिए सबको साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। इसके लिए कानून का सहारा लेना पडे तो लेना चाहिए। इन राजनीतिक दलों को इस तथ्य से परिचित होना चाहिए कि तीन तलाक की बुराई के कारण मुस्लिम महिलाओं का जीवन दुश्वार हो रहा है, वे हमेशा भय के साये में जीने का मजबूर हैं, वे कहीं इंसाफ की गुहार तक नहीं लगा सकतीं। इससे बुरी बात और क्या हो सकती है कि बार-बार प्रयास करने के बावजूद हम तीन तलाक पीड़ितों को न्याय नहीं दिला पा रहे। छोटी-छोटी बात पर सदन को सिर उठा लेने वाले इन दलों को महिलाओं का यह शोषण क्यांे दिखाई नहीं दे रहा। क्यों वोटों की चमक ने इनकी आंखों पर पर्दा डाल दिया है। इनका यह विरोध क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना नहीं है। चिंताजनक केवल यह नहीं कि सुप्रीम को दंडनीय अपराध ठहराने वाले अध्यादेश के बाद भी केवल तीन बार तलाक कहकर महिलाओं पर अत्याचार किया जा रहा है। अध्यादेश के बाद झटके में तलाक देने के 345 मामले सामने आ चुके हैं। इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। कई मुस्लिम संगठन भी तीन तलाक को कुरान सम्मत न मानते हुए भी चह चाह रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट और सरकार इस मामले में दखल न दें। शायद यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यकायक तलाक देने के मामले थमे नहीं हैं, इसलिए सरकार को और कड़े कदम उठाने की जरूरत है। यही बात ध्यान में रखते हुए तीन तलाक बिल में प्रावधान किया गया है कि पुलिस अपने स्तर पर अपराधी को जमानत नहीं दे पाएगी। जब तक अदालत में तलाक की कार्यवाही पूरी नहीं होती नाबालिग बच्चे मां के पास ही रहेंगे और पिता को गुजारा भŸाा देना होगा। जब समाज किसी सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध न दिखे तब फिर सरकार के पास दंडात्मक उपाय करने के अलावा और कोई चारा भी नहीं रहता। मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक लाकर सरकार न यही करने का प्रयास कर रही है, लेकिन कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दल इसमें अडंगा लगाने की कोशिश मंे जुटे हैं। क्या इन दलों के पास कानून बनाने के अलावा ऐसा कोई उपाय है जिससे मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार को रोका जा सके। अगर है तो इस उपाय को सदन में रखना चाहिए। केवल विरोध करने से कुछ नहीं होने वाला। अगर इन कांग्रेस या उसके सहयोगी संगठनों को बिल पास होने से वोटबैंक खिसकने का भय है तो उन्हें बीत लोकसभा चुनाव की समीक्षा करनी चाहिए। उनका वोटबैंक ऐसे बेवजह विरोध के चलते पहले ही दरक चुका है। बेहतर होगा कि विरोध करने वाले यह समझंे कि वे वही गलती कर रहे हैं जो शाहबानों मामले में राजीव गांधी सरकार ने की थी।
