बाल शोषण आज हमारे सामने कोई अंजान शब्द नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समाज का एक विकृत और खौफनाक सच बन चुका है। मौजूदा दौर में निर्दोंष एवं लाचार बच्चों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताडित करने की योजनाएं इतनी आम हो चुकी है कि अब तो लोग इस और ज्यादा ध्यान भी नहीं देते, जबकि वास्तविकता यह है कि बाल शोषण बच्चों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है। हाल में देश मे पहली बार बाल शोषण के मामलों की गहराई से जाच – पडताल के लिए कुछ पहल की गई है। 13 राज्यों मे किए गए इस अध्ययन से संभव है कि इससे संबंध सभी पक्षो जैसे परिवार, समुदाय, समाज एवं सरकार को मामलों की गंभीरता और उसकी वास्तविकता का पता चलें।
केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा यूनीसेफ के सहयोग से कराए गए इस अध्ययन से कई संवेदनशील तथ्य सामने आए है। अध्ययन के परिणामों से जो बात सबसे ज्यादा उभर कर सामने आई ह,ै वह यह है कि 5 से 12 साल तक की उम्र के बच्चे बाल शोषण का सबसे ज्यादा शिकार होते ह,ै हैरत की बात यह है कि हर तीन में से दो बच्चे कभी ना कभी शोषण का शिकार रहे है, अध्ययन के दौरान लगभग 53.22 प्रतिशत बच्चों ने किसी ना किसी तरह के शारीरिक शोषण की बात स्वीकारी तो 21.90 प्रतिशत बच्चों केा भयंकर शारीरिक उत्पीडन का शिकार होना, इतना ही नहीं, करीब 50.76 प्रतिशत बच्चों ने एक या दूसरे की प्रताडना कबूली है, बात इतने पर ही खत्म नहीं होती मंत्रालय की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, देश का हर दूसरा बच्चा भावानात्मक शोषण का शिकार है।
आमतौर पर माना जाता है कि बाल शोषण का मतलब बच्चों के साथ शारीरिक या भावानात्मक दुर्व्यवहार है, लेकिन सीडीसी के अनुसार, वच्चे के माता पिता या अभिभावक द्वारा किया गया हर ऐसा काम बाल शोषण के दायरे में आता है, जिससे उसके ऊपर बुरा प्रभाव पडता हो या ऐसा होने की आशंका हो या जिससे बच्चा मानसिक रूप से प्रताडित महसूस करता हो, भारत में हालत ऐसी है कि अक्सर बाल शोषण के वजूद को ही सिरे से नकार दिया जाता है लेकिन सच यह है कि हम खामोश रहकर हम बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की वारदातो को बढावा दे रहे है। देश में बाल शोषण की घटनाओं को ऐसे अंजाम दिया जाता है कि दोषी के साथ साथ पीडित बच्चे भी खुलकर सामने नहीे आते, पीडित बच्चे शर्मिंदगी के चलते कुछ भी बोलना नहीं चाहते, इसके पीछे भी हमारी सामाजिक बनावट और मानसिकता काफी हद तक जिम्मेदार है, हम भी ऐसे बच्चों को अलग नजर से देखने लगते हैं, संभवतः इसी लज्जा के चलते उन्हें दुनिया की निगाहों में खौफ नजर आता है, पश्चिमी देशों में हालात ऐसे नहीं हैं शिक्षा के कारण वहां का समाज और वहां के बच्चों में कम से कम इतना साहस तो होता ही है कि दुनिया को खुलकर अपनी आपबीती बता सकें।
पारंपरिक रूप से भारत में बच्चों के लालन पोषण की जिम्मेदारी परिवार एवं सगे संबंधियों की होती है। देश के संविधान में बच्चों के लिए कई तरह के मौलिक अधिकारों का प्रावधान किया गया है इसके बावजूद बाल शोषण जैसी गंभीर समस्याओं को देश में अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है, शर्म की बात यह है कि संगीन अपराध की श्रेणी में आने वाले इस कृत्य के वजूद से ही हम इंकार कर देते है। देश में बाल शोषण के खिलाफ बनाए गए कानूनों की भरभार है, लेकिन इसमें कई गंभीर खामियां भी है। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार, समाज एवं आम नागरिक मिलकर बच्चों के अधिकारों के महत्व का समझे और इसे पूरा करने के लिए मिलकर कदम उठाएं, अंतरर्राष्ट्रीय बाल अधिकार दिवस (19 नवंबर) या बाल दिवस (14 नवंबर) के मौकों पर इसके लिए केवल हामी भर देने से कुछ नहीं हो सकता इस दिशा में लगातार प्रयास करते रहने की जरूरत है, ताकि समाज और कानून इसके प्रति जागरूक हो।
बाल शोषण से निपटने के लिए जो कानूनी ढॉंचा उपलब्ध है लोगों को उसकी जानकारी नहीें है न कोई ऐसी प्रकिया है, जिसके द्वारा इस जागरूकता को बढाया जा सकें नतीजतन यह सामाजिक अभिशाप लगातार और गंभीर रूप धारण करता जा रहा है, यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि बच्चे ही हमारा भविष्य है और उनकी हितों की सुरक्षा किए बगैर एक सुरक्षित समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती, इसके लिए सबसे पहले हमें अपने नजरिये मे बदलाव लाना होगा। समस्या के वजूद को स्वीेकार करना होगा, यह इतना आसान नहीें है यह भी संभव है कि बदलाव के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी पडे, लेकिन यदि हम सभ्य समाज होने का दावा करते है तो हमें कभी न कभी शुरूआत करनी ही होगी।

