क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएश के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. संदीप कटारिया ने बताया कि पाकिस्तान ने पहली बार यह स्वीकार किया है कि उसकी जमीन से आतंक की फैक्ट्रियां चलाई जाती रही हैं। वह भी दो-चार नहीं, पूरी चालीस। उसने यह भी मान लिया है कि आज की तारीख में भी उसके यहां चालीस हजार आतंकवादी सक्रिय हैं। यानी वह दुनिया का ऐसा भू-भाग है, जहां आतंक की फसल लहलहाती है। वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान तीन दिन के अमेरिकी दौरे के अंतिम चरण में सांसदों को संबोधित कर रहे थे। उसी वक्त उन्होंने ये खुलासे किए कि उनकी पूर्ववर्ती सरकारों ने अमेरिका से ये चीजें छिपाई कि वहां कितने आतंकी संगठन हैं और कितने आतंकवादी तबाही की इबारत लिखने में मशगूल हैं। भारत लंबे समय से यही बात कहता आ रहा है कि दुनिया के किसी भी हिस्से में आतंकी घटना होती है तो उसके तार कहीं न कहीं पाकिस्तान की जमीन पर मौजूद जैश ए मोहम्मद का हाथ है। गौरतलब है कि वाशिंगटन यात्रा से ठीक पहले जमात उद दावा के प्रमुख और भारत में अनेक वारदातों के लिए जिम्मेदार आतंकी सरगना हाफिज सईद को वहां की सरकार ने गिरफ्तार किया है। कुछ और कदम भी उठाए गए हैं परंतु जैश से जुड़े चेहरों का कोई इलाज अभी तक नहीं किया गया है। दो दिन पहले इमरान खान की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड टंªप प्रशासन को यह विश्वास दिलाने में भी सफल हो गए हैं कि अमेरिका को असली खतरा पाक से नहीं, अफगानिस्तान से है। दरअसल, दिसंबर 2019 तक अमेरिका और नाटो देशों की फौजें अफगानिस्तान से बाहर निकलने की योजना बनाए हुए हैं। इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति टंªप को अब भी ऐसा लगता है कि इसमें दूसरे देशों में मुकाबले पाकिस्तान ज्यादा मददगार साबित हो सकता है। बुरे और अच्छे तालिबान की थ्येरी पर चलने वाले पाकिस्तान ने पहले की अमेरिकी सरकारों को भी सी तरह के सुनहरी ख्वाब दिखाकर मदद के नाम पर करोड़ों अरबों डालर झटके हैं। पाकिस्तान सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट होने के कगार पर पहुंच गई है। महंगाई चरम पर है। कोई अंतरराष्ट्रीय विŸाीय संस्था उसे नया कर्ज देने को तैयार नहीं है। मौजूदा अमेरिकी प्रशासन ने भी उसके झूठे दावों और वादों से आजिज आकर मदद का हाथ खींच लिया था और अक्टूबर में उसे ब्लैक लिस्ट में डाले जाने की तलवार भी लटकी हुई है, लिहाजा इमरान खान को लगा कि राष्ट्रपति टंªप का विश्वास अर्जित करने के लिए वह सच स्वीकार कर ले कि पाकिस्तान ही आतंकियों की शरणस्थली बना रहा है और अब अगर अमेरिका उसकी मदद बहाल करे तो वह आतंकियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने का वचन देने को तैयार है। अभी यकीनी तौर पर कोई नहीं कह सकता कि इमरान खान का यह सब स्वीकार करना वहां की सेना और आईएसआई बर्दाश्त करेगी या नहीं, क्योंकि इस बयान से पहले की सरकारें ही कटघरे में नहीं खड़ी हुई हैं, सेना और आईएसआई भी शक के दायरे में आ गई हैं। अगर इमरान खान ने सेना को भरोसे में लेकर अमेरिकी मदद हासिल करने की रणनीति के तहत यह सब स्वीकार किया है, तब हो सकता कि वह सुरिक्षत रहें। यदि उन्होंने सेना को बिना विश्वास में लिए अमेरिकी धरती पर यह सब स्वीकार किया है तो नवाज शरीफ की तरह उनके भी बुरे दिन शुरू हो सकते हैं। आने वाले कुछ महीनों में उनका भी वह हश्र हो सकता है, जो मिया शरीफ का हुआ है। जिन तथ्यों का खुलासा इमरान खान ने किया है, उनके बारे में भारत और अमेरिका ही नहीं, पहले से सब जानते हैं। सिर्फ वहां की सेना यह नहीं चाहती कि उसके बोए हुए आतंक के बीज के बारे में काई पाकिस्तानी प्रधानमंत्री स्वीकार करे। इमरान ने यह काम कर दिया है, लिहाजा आने वाले दिन उनके लिए भी बहुत कष्टकारी हो सकते हैं।

