क्राइम रिफॉर्मर एसोसिएषन के राश्ट्रीय अध्यक्ष डा. संदीप कटारिया ने बताया कि अहंकार एवं बड़ेपन की भावना जीवन की अजीब विसंगति है। मनुश्य चाहकर भी अहं को झुका नहीं पाता, अहं की पकड़ को ढीली नहीं कर पाता। यह जानते हुए भी कि स्वयं को बड़ा मानने का अहं जीवन के हर मोड़ पर व्यक्ति को अकेला कर देता है। हर मनुश्य में अहंकार की मनोवृत्ति होती है। वह दूसरे को नीचा दिखाकर अपने को ऊंचा दिखाना चाहता है। आदमी का सबसे बड़ा रस इस बात में होता है कि और सब छोटे बने रहें, मैं बड़ा बन जाऊं। कितना स्वार्थी एवं संकीर्ण बन गया इंसान कि उसे अपने सुख के सिवाय कुछ और नजर ही नहीं आता। स्वयं की अस्मिता को ऊंचाइयां देने के लिए वह कितनों के श्रम का शोशण, भावनाओं से खिलवाड़ एवं सुख का सौदा करता है। उसकी अंतहीन महत्वाकांक्षाएं पर्यावरण तक को जख्मी बना रही है। आखिर इस अनर्थकारी परंपरा एवं सोच पर कैसे नियंत्रण स्थापित हो?
चाहे पचास व्यक्तियों पर हुकूमत करो या पचास हजार पर, हुकूमत तो हुकूमत होती है। पर उसकी सीमा तो है। कोई भी एक व्यक्ति ऐसा नहीं है जो समस्त विष्व पर शासन करता हो। सबकी सीमा है। कोई जाने या न जाने, माने या न माने, कहे या न कहे, यह अहंकार प्रत्येक व्यक्ति के अन्तःकरण में ऐसा प्रतिश्ठित है कि वह छूटता ही नहीं। वह चाहता यही है कि मैं बड़ा रहूं, दूसरे छोटे रहंे। यदि दूसरे छोटे न हो तो बड़ा बनने का अर्थ ही क्या रहा? तो फिर बहुत कुछ धन, पदार्थ, पद, सत्ता होने का भी अर्थ क्या है? यह एक कठिन समस्या है। इसी से जब सत्ता का अहं जागा तो जीवन के आदर्षों को बौना बनना पड़ा। शक्ति का अहं जागा तो युद्ध के खतरों ने भयभीत किया और समृद्धि का अहं जागा तो मनुश्य-मनुश्य के बीच असमानताएं आ खड़ी हुईं।
इस तरह बहुत अधिक अहं का भाव हमारी दुनिया को छोटा करता रहा है। भीतरी और बाहरी दोनों ही दुनिया सिमटती रही हैं। तब हमारा छोटा-सा विरोध गुस्सा दिलाने लगता है। छोटी-सी सफलता अहंकार बढ़ाने लगती है। थोड़ा सा दुख अवसाद का कारण बन जाता ह। कुल मिलाकर सोच ही बिगड़ जाती है। अमेरिकी अभिनेता जॉर्ज क्लूने कहते हैं, ‘अपने ही बोले हुए को सुनते रहना ज्यादा सीखने नहीं देता।’
जीवन में कई दफा ऐसा ही होत है, जब हमें अपने आप पर बहुत गर्व होता है। हमें अपने स्वाभिमान होने का एहसास होता है। पर धीरे-धीरे यह स्वाभिमान अहंकार का रूप लेने लगता है। हम अहंकारी बन जाते हैं और दूसरों के सामने दिखावा करने लगते हैं। यह भूल जाते हैं कि हम चाहे कितने ही सफल क्यों ने हो जाएं, व्यर्थ के अहंकार और झूठे दिखावे में पड़ना हमें शर्मिंदा कर सकता है। फिर भी मनुश्य की यह दुर्बलता कायम है कि उसे कभी अपनी भूल नजर नहीं आती जबकि औरों की छोटी-सी भूल उसे अपराध लगती है। काष! पड़ोसी के छत पर बिखरा गंदगी का उलाहना देने से पहले हम अपने दरवाजे की सीढ़िया देखे लें कि कितनी साफ है। सच तो यह है कि अहं ने सदा अपनी भूलों का दंड पाया है।
